Konark Temple-The Untold Story || एक बलिदान की गाथा

Konark Temple-The Untold Story  एक बलिदान की गाथा
Konark Temple-The Untold Story  एक बलिदान की गाथा

Konark Temple आप ही से प्रार्थना कह सकते हैं या अभिलाषा के सकते हैं मन्नत के सकते हैं फरियाद कह सकते हैं पर सूर्य देवता में आस्था रखने वाले एक राजा ने भारत के उड़ीसा राज्य में एक ऐसा भव्य सूर्य मंदिर बनवाए थे जो आज भारत के सात आश्चर्य में से एक है जो अपने अंदर असीमित विज्ञान समेटे हुए हैं

 श्री भारतवर्ष दुनिया के विश्व गुरु नाम से भी जानती थी उसी भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण राज्य हैओडिशा प्राचीन काल में यह कॉलिंग के नाम से जाना जाता था कलिंग का केक कौन सा साम्राज्य के राजा  Nangula नरसिंह  देव प्रथम मात्र 18 साल की उम्र में ही का कोटिया साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली राजा गणपति के साथ युद्ध लड़ने गए थे करीब 3 साल तक नरसिंह देव निरंतर युद्ध करते रहे गणपति को पराजित कर जब नरसिंह देव बहुत सारे धन-संपत्ति के साथ कॉलिंग लौटे 

तब राज महल में उनके स्वागत की आयोजन रखी गई थीमाता कस्तूरी देवी पुत्र नरसिंह देव की वीरता से अत्यंत प्रसन्न हुई और पुत्र के सम्मुख अपने भावनाओं को प्रकाशित करके कहा तुम्हारे पिता संघ खेत्र पुरी में भगवान जगन्नाथ का भव्य मंदिर बनवाए हैं पर मैं चाहती हूं तुम और क्षेत्र Konark  में उससे भी भव्य और विशाल सूर्य मंदिर बनवाओ नरसिंह देव ने माता से पूछा सूर्य मंदिर Konark में किस लिए माता ने पुत्र के सवालों के जवाब में कहा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब बड़े ही सुंदर और सुकुमार थे नारद मुनि को परेशान कर देते थे नारद जी ने उन्हें सबक सिखाने के लिए योजना क्या 

नारद जी ने सुंदर शरीर की तारीफ करते हुए स्कॉर्पियो के साथ जल क्रीड़ा करने को उकसाया वहीं दूसरी तरफ भगवान श्री कृष्ण को जाकर कह दिया कि शंभू अपने मां समान गोपियों के साथ चल खेड़ा कर रहा है  यह बात सुनकर भगवान श्री कृष्ण अत्यंत क्रोधित होकर अपने बेटे शाम को श्राप देते हुए कहा कि  जिस सुंदर शरीर के लिए तुम्हारा इतना गुरूर है हो अभी नष्ट हो जाएगा शाम को कुष्ठ रोग हो जाता है शाम राज महल में लौट आते हैं और माता जम्मू वती को जब यह पता चलता है कि पिता श्री कृष्ण किस राह की वजह से पुत्र की अधूरी है तो सभी रानियां क्रोधित हो जाती हैं 

आखिर में नारद जी को बुलाया जाता है नारद जी ने रोग निवारण का उपाय बाहर किया और कहा कि सूर्य की पहली किरण उग्रो देश में पड़ता है जो के Konark  नाम से जाना जाता है शाम को अभी जाकर सूर्य देव की आराधना करनी होगी तभी जाकर शाम के श्राप से मुक्ति पा सकेंगे बहुत ही लंबी और कठिन यात्रा के बाद शाम कोणार्क चंद्रभागा नदी के पास पहुंचे अंजल त्यागकर 12 साल कठिन तपस्या करने के बाद सूर्य देव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और शाम को रोगमुक्त होने का वरदान दिया स्नान के पश्चात जब शाम को नदी से बाहर आते हैं तब रोग मुक्त हो चुके होते हैं 

और उनके हाथों में एक छोटा सा पत्थर होता है उनके सुंदर और सुकुमार शरीर को देखकर सभी अनुचरऔर अत्यंत प्रसन्न थे शंभू ने उस पत्थर कोवहीं स्थापित करके एक छोटा सा मंदिर बनवाया और उन्हें पता चला कि सूर्य पूजा की विधि विधान यहां पर किसी को भी पता नहीं है तबीयत चिंतित होकर कि ध्यान में बैठे चिड़िया ते पुणे प्रकट हुए और सांपों के पूछने पर बताएं कि दूर पश्चिम के साथ जो देश के मागा ब्राह्मण सूर्य पूजा की विधि विधान जानते हैं सुनते ही शाम को देश की ओर निकल पड़े 

ईरान महीनों की लंबी यात्रा के बाद तांबा 18 माह का ब्राह्मण परिवारों को साथ लेकर Konark Temple लौटे और सूर्य मंदिर में पूजा शुरू हो जाती है राज माता कस्तूरी देवी नरसिंह देव को बताते हैं कि  मैं विवाह के कई सालों तक जब मैं ने संतान थी मैंने भी उस सूर्य मंदिर में पूजा अर्चना की और तुम मुझे पुत्र के रूप में प्राप्त हुए माता की बात सुनकर नरसिंह देव मां को कौन आंख में संसार का सबसे भव्य और विशाल सूर्य मंदिर बनवाने का वचन दिया  

सदाशिव समांतराय महापात्रा बसंत राय के नाम से लोकप्रिय थे व्यास ने सहयोगी विशु महाराणा के साथ मंदिर का प्रतिरूप बनाते हैं और राजा नरसिंह डेट के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं नरसिंह देव मंदिर का प्रतिरूप देखकर अभिभूत हो जाते हैं और शीघ्र निर्माण कार्य आरंभ करने का आदेश देते हैं दूर-दूर से बड़े-बड़े पत्थर लाए गए मंदिर निर्माण कार्य तेजी से होने लगा 1200 कारीगरों ने मिलकर 12 साल में एक भव्य मंदिर बनवाए

 पर लाख कोशिशों के बाद भी उस विशाल मंदिर के गुंबद पर कलश स्थापित नहीं हो पा रहा था किसी चुंबकीय पदार्थ से बना हुआ था वहीं दूसरी तरफ राजा नरसिंह देव ने आदेश दिया कि कल रात्रि काल तक अगर कल स्थापित नहीं हुआ तो सभी कार्यक्रमों के सर धड़ से अलग कर दिया  जाएंगे यह बात सुनकर सभी स्त्री कारण किस सोच में डूब जाते हैं 

आखिर करे तो करे क्या मुख्य शिल्पी विश्व महाराणा घर से निकलने के वक्त उनका एक बेटा हुआ था जिसका नाम था  धर्म पाद उसे प्यार से धर्मा बुलाते थे धर्मा सूर्य मंदिर के प्रतिरूप पर कलश बिठाकर प्रसन्न होता है और पिता को दिखाने के लिए मां के पास जीत करता है मां अपने बगीचे के कुछ फल एक पोटली में बांध कर देती है और कहती है अपने कुत्ते बोलियां को साथ लेकर Konark Temple जाओ धर्म Konark  पहुंचता अपने    बलिया आपने मालिक को पहचान जाता है और उनसे जाकर लिपट जाता है धर्म अपने पिता को प्रणाम करता है और अपना परिचय देता है 

सभी कारीगरों को चिंता में देखकर धर्मा इसका कारण पूछता है कारण जानकर शर्मा अपने पिता से कहता है आप आज्ञा देंगे तो मैं मंदिर के गुंबद पर कलश  बैठा सकता हूं  सुबह संतरे को अनुमति देते हैं शर्मा गुंबद पर चढ़ जाता है और कुछ समय के प्रयत्न के पश्चात वह कलश स्थापित करने में सफल हो जाता है कुंभ पर कलश स्थापित होते ही सूर्य देव की भव्य प्रतिमा चुंबक के प्रभाव से हवा में उड़ने लगती है यह देखकर सभी कार्य कर बहुत खुश होते हैं कुछ कार्य कर इस बात का खुलकर विरोध किया और कहा कि राजा को यह पता चलेगा कि जो काम पाराशर मिलकर नहीं कर पाए वह काम एक 12 साल के लड़के ने कर दिखाया तो राजा हम सभी को मृत्युदंड देंगे 

यह बात सुनकर शर्मा ने सोचा मेरी जिंदगी से ज्यादा मूल्यवान है 12100 कारीगर की जिंदगी  धर्मपत्नी अपने पिता को समझाया और गुंबद पर चढ़कर नीचे समुद्र में कूद गया  इसके कुछ समय से उपस्थित राजा नरसिंह देव मंदिर के सम्मुख उपस्थित हुए सूर्य देव की भव्य प्रतिमा को हवा में झूलता हुआ देखकर नरसिंह देव अत्यंत प्रसन्न हुए और श्रीशांत राय की तारीफ करते थके नहीं राजा नरसिंह देव ने घोषणा किया कि माघ शुक्ल सप्तमी के दिन मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा संपन्न किया जाएगा प्रशांत राय ने कहा राजन अच्छा है पर मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए यह सही समय नहीं है पर राजा नरसिंह देव अपने जीत में अड़े रहे और उसी तिथि में मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा किया जाएगा घोषणा कर दिया गया और  सेब संतराए ने वाद विवाद ना करते हुए वहां से चले जाते हैं 

निर्धारित मंदिर का संपन्न हुआ इस मंदिर में कुछ रहस्यमई घटना होने लगी सबसे पहले मंदिर लागे एक विशाल शेर की मूर्ति नीचे गिर गया फिर मंदिर से अनेकों पत्थर गिरने लगे और राजा नरसिंह देव को जब यह पता चला कि इस मंदिर का पहला दिवस एक 12 साल के लड़के के मौत से शुरू हुआ है तब इस मंदिर में पूजा रोक दिया गया कई सालों तक यह मंदिर और उसके आसपास के इलाके घने जंगलों में परिवर्तित हो गए थे और सूर्य देव की भव्य प्रतिमा घने जंगलों में कहीं छुप गया था 

अंग्रेजों के शासन काल में इस मंदिर का अतिथि पता लगने पर उन्होंने ही इस मंदिर का पुनरुद्धार किया था और हां आप उस भव्य मंदिर का टूटा हुआ ही देख रहे हैं इस मंदिर के निर्माण की कहानी मंदिर में 52 मीटर का चुंबक पत्थर लगाया गया था पास में गुजरने वाली जहाजों को अपनी ओर खींच लेती थी और किस को पाने के लिए बहुत सारे युद्ध हुए थे अगर आप Konark Temple चुंबक के बारे में जानना चाहते हैं तो मुझे कमेंट में बता सकते हैं अगर आपको यह Post अच्छा लगा तो लाइक कीजिए अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिए 

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